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mahabharat 14.58.12: उत्तंक ने कहा - राजन! धर्माचार्यों ने उसे ब्राह्मण कहा है जो वाणी पर संयम रखता है और सत्यभाषी है। जो अपने मित्रों के साथ अन्याय करता है, वह चोर माना गया है। 12.   |   mahabharat अध्याय 14.58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  14.58.12 
उत्तङ्क उवाच
प्राहुर्वाक्संयतं विप्रं धर्मनैपुणदर्शिन:।
मित्रेषु यश्च विषम: स्तेन इत्येव तं विदु:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक ने कहा - राजन! धर्माचार्यों ने उसे ब्राह्मण कहा है जो वाणी पर संयम रखता है और सत्यभाषी है। जो अपने मित्रों के साथ अन्याय करता है, वह चोर माना गया है। 12.
 
Uttanka said - King! The religious scholars have called him a Brahmin who controls his speech and is truthful. He who behaves unfairly with his friends is considered a thief. 12.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)