श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 58: कुण्डल लेकर उत्तंकका लौटना, मार्गमें उन कुण्डलोंका अपहरण होना तथा इन्द्र और अग्निदेवकी कृपासे फिर उन्हें पाकर गुरुपत्नीको देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  14.58.10 
उत्तङ्क उवाच
राजंस्तथेह कर्तास्मि पुनरेष्यामि ते वशम्।
प्रश्नं च कंचित् प्रष्टुं त्वां निवृत्तोऽस्मि परंतप॥ १०॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक ने कहा, "हे राजन! हे शत्रुओं को कष्ट देने वाले राजन! मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूँगा और पुनः आपका अधीनस्थ हो जाऊँगा; किन्तु अब मैं आपसे एक प्रश्न पूछने आया हूँ।"
 
Uttanka said, "O King! O king who torments his enemies! I will fulfill my promise and once again become your subordinate; but now I have come back to you to ask a question."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)