श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 57: उत्तंकका सौदाससे उनकी रानीके कुण्डल माँगना और सौदासके कहनेसे रानी मदयन्तीके पास जाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  14.57.12 
उत्तङ्क उवाच
प्रतिग्राह्यो मतो मे त्वं सदैव पुरुषर्षभ।
सोऽहं त्वामनुसम्प्राप्तो भिक्षितुं मणिकुण्डले॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक ने कहा, "हे महात्मन! मैं आपके दान को सदैव स्वीकार करने योग्य समझता हूँ। इस बार मैं आपकी रानी के दो बहुमूल्य कुण्डल माँगने आया हूँ।"
 
Uttanka said, "O great man! I always consider your donation worthy of acceptance. This time I have come here to ask for your queen's two precious earrings."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)