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mahabharat 14.56.7-8h: परन्तु अपने गुरु (शिक्षक) से प्रेम करने वाले वह ऋषि यह न जान सके कि मैं वृद्ध हो गया हूँ। राजेन्द्र! एक दिन उत्तंक मुनि लकड़ियाँ लेने वन में गए और वहाँ से लकड़ियों का एक बहुत बड़ा भार उठा लाए।   |   mahabharat अध्याय 14.56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना  »  श्लोक 7-8h
 
 
श्लोक  14.56.7-8h 
न चान्वबुध्यत तदा स मुनिर्गुरुवत्सल:।
तत: कदाचिद् राजेन्द्र काष्ठान्यानयितुं ययौ॥ ७॥
उत्तङ्क: काष्ठभारं च महान्तं समुपानयत्।
 
 
अनुवाद
परन्तु अपने गुरु (शिक्षक) से प्रेम करने वाले वह ऋषि यह न जान सके कि मैं वृद्ध हो गया हूँ। राजेन्द्र! एक दिन उत्तंक मुनि लकड़ियाँ लेने वन में गए और वहाँ से लकड़ियों का एक बहुत बड़ा भार उठा लाए।
 
But that sage who loved his Guru (teacher) could not know that I have become old. Rajendra! One day Uttank Muni went to the forest to collect wood and brought a huge load of wood from there. 7 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)