श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.56.5 
स तस्य दमशौचाभ्यां विक्रान्तेन च कर्मणा।
सम्यक् चैवोपचारेण गौतम: प्रीतिमानभूत्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
गौतम भगवान् उत्तंक के इन्द्रिय-संयम, आन्तरिक और बाह्य पवित्रता, पुरुषार्थ, कर्म और उत्तम सेवा से अत्यन्त प्रसन्न हुए॥5॥
 
Gautama was very happy with Uttanka's control of senses, inner and outer purity, effort, action and excellent service. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)