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mahabharat 14.56.4: जनमेजय! गौतम के अनेक शिष्य थे, किन्तु उत्तंक के प्रति उनका प्रेम और स्नेह सर्वाधिक था।   |   mahabharat अध्याय 14.56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  14.56.4 
गौतमस्य तु शिष्याणां बहूनां जनमेजय।
उत्तङ्केऽभ्यधिका प्रीति: स्नेहश्चैवाभवत् तदा॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! गौतम के अनेक शिष्य थे, किन्तु उत्तंक के प्रति उनका प्रेम और स्नेह सर्वाधिक था।
 
Janamejaya! Gautama had many disciples, but he had the greatest love and affection for Uttank.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)