वैशम्पायन उवाच
उत्तङ्कस्तु महाराज पुनरेवाब्रवीद् वच:।
आज्ञापयस्व मां मात: कर्तव्यं च तव प्रियम्॥ २८॥
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, "महाराज! गुरुपत्नी के वचन सुनकर उत्तंक ने पुनः कहा, 'माता! मुझे आज्ञा दीजिए - मैं क्या करूँ? मुझे आपका प्रिय कार्य अवश्य करना चाहिए।'॥ 28॥
Vaishmpayana says, "Maharaj! After listening to the words of the Guru's wife, Uttanka again said, 'Mother! Please order me - what should I do? I must do your favourite work.'॥ 28॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥