श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  14.56.28 
वैशम्पायन उवाच
उत्तङ्कस्तु महाराज पुनरेवाब्रवीद् वच:।
आज्ञापयस्व मां मात: कर्तव्यं च तव प्रियम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, "महाराज! गुरुपत्नी के वचन सुनकर उत्तंक ने पुनः कहा, 'माता! मुझे आज्ञा दीजिए - मैं क्या करूँ? मुझे आपका प्रिय कार्य अवश्य करना चाहिए।'॥ 28॥
 
Vaishmpayana says, "Maharaj! After listening to the words of the Guru's wife, Uttanka again said, 'Mother! Please order me - what should I do? I must do your favourite work.'॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)