Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.56.27: अहल्या बोलीं, "भोले ब्राह्मण! मैं तुम्हारी भक्ति से सदैव संतुष्ट रहती हूँ। पुत्र! मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है। तुम्हारा कल्याण हो। अब जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ जाओ।" | mahabharat अध्याय 14.56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अहल्योवाच
परितुष्टास्मि ते विप्र नित्यं भक्त्या तवानघ।
पर्याप्तमेतद् भद्रं ते गच्छ तात यथेप्सितम्॥ २७॥
अनुवाद
अहल्या बोलीं, "भोले ब्राह्मण! मैं तुम्हारी भक्ति से सदैव संतुष्ट रहती हूँ। पुत्र! मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है। तुम्हारा कल्याण हो। अब जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ जाओ।"
Ahalya said, "Innocent Brahmin! I am always satisfied with your devotion. Son! This is enough for me. May you be blessed. Now go wherever you wish."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥