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mahabharat 14.56.22-23: भृगुकुलभूषण! इस प्रकार तुम मुझे पूर्णतः संतुष्ट समझो। यदि आज तुम सोलह वर्ष के युवक हो जाओ, तो मैं तुम्हें अपनी कुमारी कन्या पत्नी के रूप में अर्पित कर दूँगा; क्योंकि उसके अतिरिक्त कोई अन्य स्त्री तुम्हारे तेज को सहन नहीं कर सकती।   |   mahabharat अध्याय 14.56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  14.56.22-23 
इत्थं च परितुष्टं मां विजानीहि भृगूद्वह।
युवा षोडशवर्षो हि यद्यद्य भविता भवान्॥ २२॥
ददानि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज।
एतामृतेऽङ्गना नान्या त्वत्तेजोऽर्हति सेवितुम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
भृगुकुलभूषण! इस प्रकार तुम मुझे पूर्णतः संतुष्ट समझो। यदि आज तुम सोलह वर्ष के युवक हो जाओ, तो मैं तुम्हें अपनी कुमारी कन्या पत्नी के रूप में अर्पित कर दूँगा; क्योंकि उसके अतिरिक्त कोई अन्य स्त्री तुम्हारे तेज को सहन नहीं कर सकती।
 
Bhrigukulbhushan! In this way you should consider me completely satisfied. If today you become a sixteen year old youth, then I will offer you my virgin daughter as my wife; because apart from her no other woman can bear your brilliance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)