श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 56: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  14.56.13 
तस्या निपेततुर्दग्धौ करौ तैरश्रुबिन्दुभि:।
न हि तानश्रुपातांस्तु शक्ता धारयितुं मही॥ १३॥
 
 
अनुवाद
उन अश्रुबिन्दुओं ने उसके दोनों हाथ जला दिए और आँसुओं के साथ पृथ्वी को भी स्पर्श किया। परन्तु पृथ्वी भी उन गिरते हुए अश्रुबिन्दुओं को धारण करने में असमर्थ हो गई॥13॥
 
Those teardrops burnt both his hands and along with the tears, they touched the earth. But the earth too became incapable of holding those falling teardrops.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)