श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 55: श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.55.5 
स ददर्श महात्मानं विश्वरूपं महाभुजम्।
सहस्रसूर्यप्रतिमं दीप्तिमत् पावकोपमम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक मुनि ने उस विराट् रूप को देखा, जिसका स्वरूप महान था। वह हजारों सूर्यों के समान चमक रहा था और विशाल भुजाओं से सुशोभित था। उसमें से प्रज्वलित अग्नि के समान ज्वालाएँ निकल रही थीं। ॥5॥
 
Uttanka Muni saw the cosmic form whose form was great. It was shining like thousands of Suns and was adorned with huge arms. Flames were coming out of it like a blazing fire. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)