श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 55: श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  14.55.37 
इत्युक्त: प्रीतिमान् विप्र: कृष्णेन स बभूव ह।
अद्याप्युत्तङ्कमेघाश्च मरौ वर्षन्ति भारत॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर विप्रवर उत्तंक मुनि बहुत प्रसन्न हुए। इस समय भी मरुस्थल में भयंकर बादल प्रकट होकर जल बरसाते हैं। 37॥
 
India Vipravar Uttank Muni was very happy when Lord Krishna said this. Even at this time, fierce clouds appear in the desert and rain water. 37॥
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तङ्कोपाख्यानमें कृष्णवाक्यविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५५॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)