श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 55: श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना  »  श्लोक 30-32
 
 
श्लोक  14.55.30-32 
स मां प्रसाद्य देवेन्द्र: पुनरेवेदमब्रवीत्।
यदि देयमवश्यं वै मातङ्गोऽहं महामते॥ ३०॥
भूत्वामृतं प्रदास्यामि भार्गवाय महात्मने।
यद्येवं प्रतिगृह्णाति भार्गवोऽमृतमद्य वै॥ ३१॥
प्रदातुमेष गच्छामि भार्गवस्यामृतं विभो।
प्रत्याख्यातस्त्वहं तेन दास्यामि न कथंचन॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
तब देवराज इन्द्र ने प्रसन्न होकर मुझसे कहा—'सर्वदेवमय महामते! यदि अमृत भृगुपुत्र उत्तंक को ही देना है, तो मैं चाण्डाल का रूप धारण करके उसे अमृत पिला दूँगा। यदि आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार कर ले, तो मैं अभी उसे वर देने जा रहा हूँ और यदि वह मना कर दे, तो मैं उसे किसी भी प्रकार अमृत नहीं दूँगा।'॥30-32॥
 
‘Then the king of gods Indra pleased me and said—‘Omnipresent Mahamate! If the nectar must be given to Bhrigu's son Uttank, then I will take the form of a Chandala and give him the nectar. If today Bhrigu's descendant Uttank accepts to take the nectar, then I am going right now to grant him a boon and if he refuses, then I will not give him the nectar in any way.'॥ 30-32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)