श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 55: श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना  »  श्लोक 27-29
 
 
श्लोक  14.55.27-29 
मया त्वदर्थमुक्तो वै वज्रपाणि: पुरंदर:॥ २७॥
उत्तङ्कायामृतं देहि तोयरूपमिति प्रभु:।
स मामुवाच देवेन्द्रो न मर्त्योऽमर्त्यतां व्रजेत्॥ २८॥
अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद् भृगुनन्दन।
अमृतं देयमित्येव मयोक्त: स शचीपति:॥ २९॥
 
 
अनुवाद
भृगु नंदन! मैं आपके लिए वज्रधारी इंद्र के पास गया था और उनसे ऋषि उत्तंक को जल रूपी अमृत देने का अनुरोध किया था। मेरी बातें सुनकर प्रभावशाली देवेंद्र ने मुझसे बार-बार कहा कि 'मनुष्य अमर नहीं हो सकता। इसलिए उसे अमृत देने के बजाय कोई अन्य वर दीजिए।' किन्तु मैंने शचीपति इंद्र से आग्रह किया कि उत्तंक को अमृत अवश्य दिया जाए।
 
Bhrigu Nandan! I had gone to Vajradhari Indra for you and requested him to give Amrit in the form of water to sage Uttanka. On hearing my words, the influential Devendra repeatedly told me that 'Man cannot become immortal. Therefore, instead of giving Amrit to him, give him some other boon.' But I insisted on Sachipati Indra that Uttanka must be given Amrit.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)