श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 55: श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना  »  श्लोक 23-25h
 
 
श्लोक  14.55.23-25h 
अथ तेनैव मार्गेण शङ्खचक्रगदाधर:॥ २३॥
आजगाम महाबुद्धिरुत्तङ्कश्चैनमब्रवीत्।
न युक्तं तादृशं दातुं त्वया पुरुषसत्तम॥ २४॥
सलिलं विप्रमुख्येभ्यो मातङ्गस्रोतसा विभो।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उसी मार्ग से शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उन्हें देखकर महामति उत्तंक ने कहा- 'पुरुषोत्तम! प्रभु! चाण्डाल द्वारा स्पर्श किया हुआ ऐसा अशुद्ध जल श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देना उचित नहीं है।' 23-24 1/2
 
Thereafter Lord Krishna holding conch, discus and mace appeared from the same path. Seeing him Mahamati Uttanka said- 'Purushottam! Prabhu! It is not proper to give you such impure water touched by a Chandala for the best Brahmins.' 23-24 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)