श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 55: श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  14.55.12 
तमब्रवीत् पुन: कृष्णो मा त्वमत्र विचारय।
अवश्यमेतत् कर्तव्यममोघं दर्शनं मम॥ १२॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर श्रीकृष्ण ने पुनः कहा - 'मुनि! इस विषय में आप अन्यथा न सोचें। आप मुझसे अवश्य ही कोई वर मांगें; क्योंकि मेरा दर्शन अमोघ है।'॥12॥
 
Hearing this, Shri Krishna again said - 'Muni! Do not think otherwise in this matter. You must definitely ask for a boon from me; because my darshan is infallible'॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)