श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 55: श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  14.55.10 
वैशम्पायन उवाच
तमुवाच प्रसन्नात्मा गोविन्दो जनमेजय।
वरं वृणीष्वेति तदा तमुत्तङ्कोऽब्रवीदिदम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! मुनि की बात सुनकर सदैव प्रसन्न रहने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- ‘महर्षि! आप मुझसे वर माँगिए।’ तब उत्तंक ने कहा- 10॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Lord Shri Krishna, who is always happy after listening to the sage, said - 'Maharshe! You ask for a boon from me.' Then Uttanka said - 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)