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mahabharat 14.54.5: विद्वान् लोग जिन्हें सत्य और असत्य, व्यक्त और अव्यक्त, अक्षर और अक्षर कहते हैं, वे सब मेरे ही स्वरूप हैं ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 14.54: भगवान‍् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 54: भगवान‍् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.54.5 
सदसच्चैव यत् प्राहुरव्यक्तं व्यक्तमेव च।
अक्षरं च क्षरं चैव सर्वमेतन्मदात्मकम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
विद्वान् लोग जिन्हें सत्य और असत्य, व्यक्त और अव्यक्त, अक्षर और अक्षर कहते हैं, वे सब मेरे ही स्वरूप हैं ॥5॥
 
What the learned call true and false, expressed and unexpressed, syllables and letters, all these are My form. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)