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mahabharat 14.54.20: इस समय मैं मनुष्य रूप में अवतरित हुआ हूँ, अतः कौरवों पर अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करने के स्थान पर मैंने विनम्रतापूर्वक उनसे युद्ध विराम की प्रार्थना की; किन्तु मोहवश उन्होंने मेरी हितकारी सलाह नहीं सुनी।   |   mahabharat अध्याय 14.54: भगवान‍् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 54: भगवान‍् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  14.54.20 
मानुष्ये वर्तमाने तु कृपणं याचिता मया।
न च ते जातसम्मोहा वचोऽगृह्णन्त मे हितम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
इस समय मैं मनुष्य रूप में अवतरित हुआ हूँ, अतः कौरवों पर अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग करने के स्थान पर मैंने विनम्रतापूर्वक उनसे युद्ध विराम की प्रार्थना की; किन्तु मोहवश उन्होंने मेरी हितकारी सलाह नहीं सुनी।
 
At this time I have incarnated in the human form, therefore instead of using my divine powers on the Kauravas I humbly prayed for a truce; but being infatuated they did not listen to my beneficial advice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)