Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.54.15-16: मैं पाप में लिप्त समस्त मनुष्यों को दण्ड देने वाला तथा अपनी मर्यादा से कभी विचलित न होने वाला ईश्वर हूँ। जब-जब युग बदलता है, तब-तब मैं लोक-कल्याण के लिए भिन्न-भिन्न योनियों में प्रवेश करता हूँ और धर्म की मर्यादा स्थापित करता हूँ। ॥15-16॥ | mahabharat अध्याय 14.54: भगवान् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मैं पाप में लिप्त समस्त मनुष्यों को दण्ड देने वाला तथा अपनी मर्यादा से कभी विचलित न होने वाला ईश्वर हूँ। जब-जब युग बदलता है, तब-तब मैं लोक-कल्याण के लिए भिन्न-भिन्न योनियों में प्रवेश करता हूँ और धर्म की मर्यादा स्थापित करता हूँ। ॥15-16॥
I am the God who punishes all the people who are involved in sin and who never deviates from my limits. Whenever the era changes, I enter different species for the welfare of the people and establish the limits of religion. ॥ 15-16॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥