श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 53: मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तङ्क मुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.53.5 
वायुर्वेगेन महता रथस्य पुरतो ववौ।
कुर्वन्नि:शर्करं मार्गं विरजस्कमकण्टकम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उसके रथ के आगे-आगे बड़े वेग से वायु चलती और मार्ग की धूल, कंकड़ और काँटों को उड़ा ले जाती ॥5॥
 
The wind would blow with great force in front of his chariot and would blow away the dust, pebbles and thorns on the path. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)