श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 53: मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तङ्क मुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  14.53.2 
पुन: पुनश्च वार्ष्णेयं पर्यष्वजत फाल्गुन:।
आ चक्षुर्विषयाच्चैनं स ददर्श पुन: पुन:॥ २॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन ने अपने प्रिय मित्र वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण को बार-बार गले लगाया और उनकी ओर तब तक देखते रहे, जब तक वे उनकी दृष्टि से ओझल नहीं हो गए॥2॥
 
Arjuna embraced his dear friend Sri Krishna of the Vrishni clan again and again and kept looking at Him until He disappeared from his sight.॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)