श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 53: मार्गमें श्रीकृष्णसे कौरवोंके विनाशकी बात सुनकर उत्तङ्क मुनिका कुपित होना और श्रीकृष्णका उन्हें शान्त करना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  14.53.16-17 
न दिष्टमप्यतिक्रान्तुं शक्यं बुद्धॺा बलेन वा॥ १६॥
महर्षे विदितं भूय: सर्वमेतत् तवानघ।
तेऽत्यक्रामन् मतिं मह्यं भीष्मस्य विदुरस्य च॥ १७॥
 
 
अनुवाद
महर्षे! बुद्धि या बल से कोई भी भाग्य के नियमों को नहीं मिटा सकता। ऊँघ! आपको ये सब बातें अवश्य ज्ञात होंगी कि कौरवों ने मेरी, भीष्मजी की और विदुरजी की सलाह को भी अस्वीकार कर दिया था। 16-17॥
 
Maharshe! No one can erase the rules of destiny through intelligence or force. Ungh! You must be aware of all these things that the Kauravas rejected my advice, Bhishmaji's and Vidurji's advice also. 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)