स गच्छ रत्नान्यादाय विविधानि वसूनि च।
यच्चाप्यन्यन्मनोज्ञं ते तदप्यादत्स्व सात्वत॥ ४९॥
इयं च वसुधा कृत्स्ना प्रसादात् तव केशव।
अस्मानुपगता वीर निहताश्चापि शत्रव:॥ ५०॥
अनुवाद
यदुनन्दन केशव! यहाँ नाना प्रकार के रत्न और धन आपके लिए प्रस्तुत हैं। इन्हें तथा अपनी रुचि की अन्य वस्तुओं को लेकर आप यात्रा कीजिए। वीर! आपकी कृपा से ही इस सम्पूर्ण जगत का राज्य हमारे हाथ में आया है और हमारे शत्रु भी मारे गए हैं। 49-50।
Yadunandan Keshav! Here are various kinds of gems and wealth presented to you. Take these and other things of your liking and travel. Braveheart! It is only because of your grace that the kingdom of this entire world has come into our hands and our enemies have also been killed. 49-50.