vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 52: श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ हस्तिनापुर जाना और वहाँ सबसे मिलकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले सुभद्राके साथ द्वारकाको प्रस्थान करना
»
श्लोक 12
श्लोक
14.52.12
प्राणो वायु: सततग: क्रोधो मृत्यु: सनातन:।
प्रसादे चापि पद्मा श्रीर्नित्यं त्वयि महामते॥ १२॥
अनुवाद
नित्य वायु ही जीवन है, क्रोध ही नित्य मृत्यु है। महामते! लक्ष्मी आपके प्रसाद में विद्यमान हैं। श्रीजी सदैव आपके वक्षस्थल में निवास करती हैं।' 12॥
‘Eternal air is life, anger is eternal death. Mahamate! Lakshmi is present in your Prasad. Shriji always resides in your chest. 12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×