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mahabharat 14.50.56: जो पुरुष सम्पूर्ण प्राणियों की श्रेष्ठता और निकृष्टता को जानता है, सम्पूर्ण कर्मों की विधि को जानता है और सम्पूर्ण प्राणियों को आत्म-चेतना से देखता है, वह अविनाशी परमात्मा को प्राप्त होता है ॥56॥   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  14.50.56 
परापरज्ञो भूतानां विधिज्ञ: सर्वकर्मणाम्।
सर्वभूतात्मभूतात्मा गच्छत्यात्मानमव्ययम्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष सम्पूर्ण प्राणियों की श्रेष्ठता और निकृष्टता को जानता है, सम्पूर्ण कर्मों की विधि को जानता है और सम्पूर्ण प्राणियों को आत्म-चेतना से देखता है, वह अविनाशी परमात्मा को प्राप्त होता है ॥56॥
 
The person who knows the superiority and inferiority of all beings, knows the method of all actions and looks at all living beings with self-consciousness, attains the immortal God. 56॥
 
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५०॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्यसंवादविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)