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mahabharat 14.50.42-43h: पृथ्वी पर दस प्रकार की गंधों को समझना चाहिए - अच्छी (सुगंध), बुरी (दुर्गंध), मधुर, खट्टी, कड़वी, दुर्गन्धहीन (दूर तक पहुँचने वाली), मिश्रित, कसैली, रूखी और ज्वलंत। 42 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 42-43h
 
 
श्लोक  14.50.42-43h 
इष्टश्चानिष्टगन्धश्च मधुरोऽम्ल: कटुस्तथा।
निर्हारी संहत: स्निग्धो रूक्षो विशद एव च॥ ४२॥
एवं दशविधो ज्ञेय: पार्थिवो गन्ध इत्युत।
 
 
अनुवाद
पृथ्वी पर दस प्रकार की गंधों को समझना चाहिए - अच्छी (सुगंध), बुरी (दुर्गंध), मधुर, खट्टी, कड़वी, दुर्गन्धहीन (दूर तक पहुँचने वाली), मिश्रित, कसैली, रूखी और ज्वलंत। 42 1/2॥
 
One should understand the ten types of earthly smells - good (scent), bad (bad smell), sweet, sour, bitter, non-smelling (far-reaching), mixed, astringent, dry and vivid. 42 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)