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mahabharat 14.50.21: जैसे जब कोई मनुष्य अचानक ही किसी ऐसे लंबे मार्ग पर चलने लगता है, जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा (तब वह अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाता), वही दशा सम्यक् ज्ञान से रहित अज्ञानी पुरुष की होती है ॥21॥   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  14.50.21 
यथा च दीर्घमध्वानं पद्‍भ्यामेव प्रपद्यते।
अदृष्टपूर्वं सहसा तत्त्वदर्शनवर्जित:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जैसे जब कोई मनुष्य अचानक ही किसी ऐसे लंबे मार्ग पर चलने लगता है, जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा (तब वह अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाता), वही दशा सम्यक् ज्ञान से रहित अज्ञानी पुरुष की होती है ॥21॥
 
Just as when a man suddenly starts walking on a long path that he has not seen before (he is unable to reach his destination), the same is the condition of an ignorant man who is devoid of the right kind of knowledge. ॥21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)