Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 14.50.20: इसी प्रकार (जो मनुष्य अपने पूर्वजन्मों के पुण्यों से हीन है) जब योगमार्ग में प्रवृत्त होता है, तो उसे योगसिद्धि का फल कठिनाई से प्राप्त होता है, अथवा हो सकता है कि मिलता ही न हो। मनुष्य का अपना कल्याण साधन ही उसे उसके पूर्वजन्म के शुभ-अशुभ संस्कारों का ज्ञान कराता है। 20॥   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  14.50.20 
तथा कर्मसु विज्ञेयं फलं भवति वा न वा।
पुरुषस्यात्मनि:श्रेय: शुभाशुभनिदर्शनम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार (जो मनुष्य अपने पूर्वजन्मों के पुण्यों से हीन है) जब योगमार्ग में प्रवृत्त होता है, तो उसे योगसिद्धि का फल कठिनाई से प्राप्त होता है, अथवा हो सकता है कि मिलता ही न हो। मनुष्य का अपना कल्याण साधन ही उसे उसके पूर्वजन्म के शुभ-अशुभ संस्कारों का ज्ञान कराता है। 20॥
 
Similarly (a man who is inferior in the virtues of his previous births) when he engages in the path of Yoga, he attains the fruit of Yogasiddhi with difficulty or may not at all. It is the man's own means of welfare that tells him about the good and bad rituals of his previous birth. 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)