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mahabharat 14.50.10: ज्ञानी पुरुष कहता है कि सत्त्व द्वैत है और क्षेत्रज्ञ कहता है कि वह द्वंद्वरहित, शुद्ध, नित्य और निर्गुण है ॥10॥   |   mahabharat अध्याय 14.50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 50: सत्त्व और पुरुषकी भिन्नता, बुद्धिमान‍्की प्रशंसा, पञ्चभूतोंके गुणोंका विस्तार और परमात्माकी श्रेष्ठताका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  14.50.10 
नित्यं द्वन्द्वसमायुक्तं सत्त्वमाहुर्मनीषिण:।
निर्द्वन्द्वो निष्कलो नित्य: क्षेत्रज्ञो निर्गुणात्मक:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
ज्ञानी पुरुष कहता है कि सत्त्व द्वैत है और क्षेत्रज्ञ कहता है कि वह द्वंद्वरहित, शुद्ध, नित्य और निर्गुण है ॥10॥
 
The wise man says that Sattva is dual and the field expert says that it is without conflict, pure, eternal and without any qualities. 10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)