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mahabharat 14.47.7: जो विद्वान संयोग को वियोग के रूप में देखता है और इसी प्रकार अनेकता में एकता को देखता है, वह दुःख से पूर्णतया मुक्त हो जाता है ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 14.47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  14.47.7 
यो विद्वान् सहवासं च विवासं चैव पश्यति।
तथैवैकत्वनानात्वे स दु:खात् प्रतिमुच्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो विद्वान संयोग को वियोग के रूप में देखता है और इसी प्रकार अनेकता में एकता को देखता है, वह दुःख से पूर्णतया मुक्त हो जाता है ॥7॥
 
The scholar who sees coincidence as separation and similarly sees unity in diversity, becomes completely free from sorrow. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)