Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.47.17: जो सार अर्थात् मूल प्रकृति संख्या से रहित है, वह अचेतन है। उससे भिन्न जो आत्मा है, वह अन्तर्यामी परमेश्वर द्वारा ज्ञान से युक्त है। जब उसी क्षेत्र को जानने वाला समस्त तत्त्वों को जान लेता है, तब वह समस्त गुणों से परे होकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। 17॥ | mahabharat अध्याय 14.47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जो सार अर्थात् मूल प्रकृति संख्या से रहित है, वह अचेतन है। उससे भिन्न जो आत्मा है, वह अन्तर्यामी परमेश्वर द्वारा ज्ञान से युक्त है। जब उसी क्षेत्र को जानने वाला समस्त तत्त्वों को जान लेता है, तब वह समस्त गुणों से परे होकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। 17॥
The essence, that is, the basic nature, which is devoid of number, is unconscious. The soul which is different from that, is endowed with knowledge by the inner God. When the one who knows the same area knows all the elements, then he transcends all the qualities and becomes free from all sins. 17॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४७॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥