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mahabharat 14.47.12-15: यह शरीर एक वृक्ष के समान है। अज्ञान इसकी जड़ है, बुद्धि इसका तना है, अहंकार इसकी शाखा है, इन्द्रियाँ इसका अंकुर और खोखलापन हैं तथा पंचभूत इसे विशाल बनाते हैं और इसकी शोभा बढ़ाते हैं। इसमें संकल्प रूपी पत्ते सदैव लगते रहते हैं और कर्म रूपी फूल खिलते रहते हैं। शुभ-अशुभ कर्मों से प्राप्त होने वाले सुख-दुःख आदि फल ही इसके साथ सदैव लगे रहते हैं। इस प्रकार ब्रह्म के बीज से उत्पन्न होकर प्रवाह रूप में सदैव विद्यमान रहने वाला यह शरीर रूपी वृक्ष समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है। जब कोई बुद्धिमान पुरुष तत्त्वज्ञान रूपी तलवार से इस वृक्ष को टुकड़े-टुकड़े करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था के चक्र में बाँधे रखने वाले मोह रूपी बंधनों को तोड़कर आसक्ति और अहंकार से मुक्त हो जाता है, तब उसे अवश्य ही मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 14.47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन  »  श्लोक 12-15
 
 
श्लोक  14.47.12-15 
अव्यक्तयोनिप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान्।
महाहंकारविटप इन्द्रियाङ्कुरकोटर:॥ १२॥
महाभूतविशालश्च विशेषयति शाखिन:।
सदापत्र: सदापुष्प: शुभाशुभफलोदय:॥ १३॥
आजीव्य: सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्ष: सनातन:।
एनं छित्त्वा च भित्त्वा च तत्त्वज्ञानासिना बुध:॥ १४॥
हित्वा सङ्गमयान् पाशान् मृत्युजन्मजरोदयान्।
निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशय:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यह शरीर एक वृक्ष के समान है। अज्ञान इसकी जड़ है, बुद्धि इसका तना है, अहंकार इसकी शाखा है, इन्द्रियाँ इसका अंकुर और खोखलापन हैं तथा पंचभूत इसे विशाल बनाते हैं और इसकी शोभा बढ़ाते हैं। इसमें संकल्प रूपी पत्ते सदैव लगते रहते हैं और कर्म रूपी फूल खिलते रहते हैं। शुभ-अशुभ कर्मों से प्राप्त होने वाले सुख-दुःख आदि फल ही इसके साथ सदैव लगे रहते हैं। इस प्रकार ब्रह्म के बीज से उत्पन्न होकर प्रवाह रूप में सदैव विद्यमान रहने वाला यह शरीर रूपी वृक्ष समस्त प्राणियों के जीवन का आधार है। जब कोई बुद्धिमान पुरुष तत्त्वज्ञान रूपी तलवार से इस वृक्ष को टुकड़े-टुकड़े करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था के चक्र में बाँधे रखने वाले मोह रूपी बंधनों को तोड़कर आसक्ति और अहंकार से मुक्त हो जाता है, तब उसे अवश्य ही मोक्ष की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है।
 
This body is like a tree. Ignorance is its root, intelligence is its trunk, ego is its branch, senses are its sprout and hollow and the five elements make it large and enhance its beauty. Leaves of resolution always grow in it and flowers of karma keep blooming. Happiness and sorrows etc., which are received from good and bad deeds, are the fruits that are always attached to it. Thus, this tree of body, which is always present in the form of flow, emerging from the seed of Brahma, is the basis of life of all living beings. When a wise man, by breaking this tree into pieces with the sword of Tattvajnana, breaks the bonds of attachment that keep one in the cycle of birth, death and old age and becomes free from attachment and ego, then he definitely attains liberation, there is no doubt in this.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)