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mahabharat 14.47.1: ब्रह्माजी बोले - महर्षि! जो वृद्ध ब्राह्मण निश्चित बातें कहते हैं और वेदों के कारणरूप परमात्मा में स्थित हैं, वे त्याग को तप कहते हैं और ज्ञान को परब्रह्म का स्वरूप मानते हैं॥1॥   |   mahabharat अध्याय 14.47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 47: मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.47.1 
ब्रह्मोवाच
संन्यासं तप इत्याहुर्वृद्धा निश्चितवादिन:।
ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ज्ञानं ब्रह्म परं विदु:॥ १॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी बोले - महर्षि! जो वृद्ध ब्राह्मण निश्चित बातें कहते हैं और वेदों के कारणरूप परमात्मा में स्थित हैं, वे त्याग को तप कहते हैं और ज्ञान को परब्रह्म का स्वरूप मानते हैं॥1॥
 
Brahmaji said – Maharshi! The old Brahmins who say certain things and are situated in God as the reason behind the Vedas, call renunciation as penance and consider knowledge as the form of Parabrahma. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)