श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 46: ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  14.46.7 
पूताभिश्च तथैवाद्भि: सदा दैवततर्पणम्।
भावेन नियत: कुर्वन् ब्रह्मचारी प्रशस्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो ब्रह्मचारी सदैव नियमों का पालन करता है और प्रतिदिन भक्तिपूर्वक देवताओं को शुद्ध जल अर्पित करता है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है ॥7॥
 
The celibate who always follows the rules and offers pure water to the gods daily with devotion, is praised everywhere. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)