vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 46: ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन
»
श्लोक 7
श्लोक
14.46.7
पूताभिश्च तथैवाद्भि: सदा दैवततर्पणम्।
भावेन नियत: कुर्वन् ब्रह्मचारी प्रशस्यते॥ ७॥
अनुवाद
जो ब्रह्मचारी सदैव नियमों का पालन करता है और प्रतिदिन भक्तिपूर्वक देवताओं को शुद्ध जल अर्पित करता है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है ॥7॥
The celibate who always follows the rules and offers pure water to the gods daily with devotion, is praised everywhere. 7॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×