श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  14.43.33 
आकाशस्य गुणो ह्येष श्रोत्रेण च स गृह्यते।
श्रोत्रस्थाश्च दिश: सर्वा: शब्दज्ञाने प्रकीर्तिता:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
आकाश का गुण, शब्द, कानों के द्वारा अनुभव किया जाता है और कानों में स्थित सभी दिशाएँ शब्द सुनने में सहायक कही गई हैं ॥33॥
 
The quality of space, the sound, is perceived by the ears, and all the directions situated in the ears are said to be helpful in hearing the sound. ॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)