श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  14.43.31 
ज्योतिषश्च गुणो रूपं चक्षुषा तच्च गृह्यते।
चक्षु:स्थश्च सदाऽऽदित्यो रूपज्ञाने विधीयते॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
प्रकाश का गुण रूप है और वह नेत्र में स्थित सूर्यदेव की सहायता से सदैव नेत्र द्वारा देखा जाता है ॥31॥
 
The quality of light is form and it is always seen by the eye with the help of the Sun-god situated in the eye. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)