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mahabharat 14.43.30: जल का स्वाभाविक गुण रस है, जो जीभ द्वारा ग्रहण किया जाता है और जीभ में स्थित चन्द्रमा उस रस के आस्वादन में सहायता करता है ॥30॥   |   mahabharat अध्याय 14.43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  14.43.30 
अपां धातू रसो नित्यं जिह्वया स तु गृह्यते।
जिह्वास्थश्च तथा सोमो रसज्ञाने विधीयते॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जल का स्वाभाविक गुण रस है, जो जीभ द्वारा ग्रहण किया जाता है और जीभ में स्थित चन्द्रमा उस रस के आस्वादन में सहायता करता है ॥30॥
 
The natural quality of water is juice, which is received by the tongue and the moon situated in the tongue helps in the tasting of that juice. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)