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mahabharat 14.43.23: गंध पृथ्वी का गुण है, जो सब प्राणियों का पोषण करती है, और ध्वनि वाणी का गुण है, जिसमें स्वर और व्यंजन की शुद्धता है ॥23॥   |   mahabharat अध्याय 14.43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 43: चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  14.43.23 
धारिणी सर्वभूतानां पृथिवी गन्धलक्षणा।
स्वरव्यञ्जनसंस्कारा भारती शब्दलक्षणा॥ २३॥
 
 
अनुवाद
गंध पृथ्वी का गुण है, जो सब प्राणियों का पोषण करती है, और ध्वनि वाणी का गुण है, जिसमें स्वर और व्यंजन की शुद्धता है ॥23॥
 
Smell is the characteristic of the Earth which sustains all living beings, and sound is the characteristic of speech which has the purity of vowels and consonants. ॥23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)