श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  14.42.56 
कामं क्रोधं भयं लोभमभिद्रोहमथानृतम्।
इन्द्रियाणां निरोधेन सदा त्यजति दुस्त्यजान्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
इन्द्रियों को सदैव संयमित करके मनुष्य काम, क्रोध, भय, लोभ, विश्वासघात और असत्य आदि समस्त दुर्गुणों का त्याग कर देता है ॥56॥
 
By always restraining the senses, man gives up all the bad qualities like lust, anger, fear, greed, betrayal and untruth. 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)