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श्री महाभारत
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पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
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अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश
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श्लोक 54
श्लोक
14.42.54
दुश्चरं सर्वलोकेऽस्मिन् सत्त्वं प्रति समाश्रितम्।
एतदेव हि लोकेऽस्मिन् कालचक्रं प्रवर्तते॥ ५४॥
अनुवाद
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जिसका भ्रमण दुःखदायी है, जो बुद्धि के अधीन है, वह इस ब्रह्माण्ड में काल का पहिया है ॥54॥
One whose wandering in the entire universe is painful, who is dependent on the intellect, is the wheel of time in this universe. ॥ 54॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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