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mahabharat 14.42.5: इस प्रकार सम्पूर्ण भटकती हुई भूत-पिशाचों में लीन होने पर भी दृढ़ स्मृति वाला धीर योगी कभी लीन नहीं होता ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 14.42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  14.42.5 
तत: प्रलीने सर्वस्मिन् भूते स्थावरजङ्गमे।
स्मृतिमन्तस्तदा धीरा न लीयन्ते कदाचन॥ ५॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार सम्पूर्ण भटकती हुई भूत-पिशाचों में लीन होने पर भी दृढ़ स्मृति वाला धीर योगी कभी लीन नहीं होता ॥5॥
 
In this way, even after being absorbed in all the wandering ghosts, a patient yogi with a strong memory never gets absorbed. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)