श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  14.42.47 
कामानात्मनि संयम्य क्षीणतृष्ण: समाहित:।
सर्वभूतसुहृन्मित्रो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष कामनाओं को अपने अन्दर समाहित कर लेता है, तृष्णाओं से रहित है, एकाग्र मन वाला है, दयालु है और समस्त प्राणियों का मित्र है, वह ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है ॥47॥
 
One who absorbs desires within himself and is free from cravings, has a focused mind and is a kind hearted and friend of all living beings, becomes eligible for attaining Brahma. 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)