श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  14.42.46 
विद्वान् कूर्म इवाङ्गानि कामान् संहृत्य सर्वश:।
विरजा: सर्वतो मुक्तो यो नर: स सुखी सदा॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जो विद्वान् पुरुष अपनी समस्त इच्छाओं को सब ओर से समेट लेता है और रजोगुण से रहित हो जाता है, वह सब प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और सदा सुखी हो जाता है ॥ 46॥
 
Just as a tortoise withdraws its limbs from all sides, similarly a learned person who withdraws all his desires from all sides and becomes devoid of Rajoguna (the mode of passion), becomes free from all kinds of bondages and becomes happy forever. ॥ 46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)