श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  14.42.45 
गुणागुणमनासङ्गमेकचर्यमनन्तरम्।
एतद् ब्रह्ममयं वृत्तमाहुरेकपदं सुखम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
जहाँ गुण तो हैं परन्तु वे प्रायः नहीं हैं, जो अभिमान से रहित है और एकान्तवासी है तथा जहाँ विवेक बिलकुल नहीं है, वह ब्रह्म-तुल्य आचरण कहा गया है; वही समस्त सुखों का एकमात्र आधार है ॥ 45॥
 
Where there are qualities but they are almost nonexistent, which is devoid of pride and follows a solitary lifestyle and where there is absolutely no discrimination, that is described as Brahma-like behaviour; that is the only basis of all happiness. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)