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mahabharat 14.42.44: महर्षि! अब मैं मन के सूक्ष्म भावों को जागृत करने वाले उस शुभ संन्यास का उपदेश करता हूँ, जो कोमल और कठोर भावों वाले सभी प्राणियों में निवास करता है॥44॥   |   mahabharat अध्याय 14.42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  14.42.44 
अत: परं प्रवक्ष्यामि सूक्ष्मभावकरीं शिवाम्।
निवृत्तां सर्वभूतेषुु मृदुना दारुणेन च॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
महर्षि! अब मैं मन के सूक्ष्म भावों को जागृत करने वाले उस शुभ संन्यास का उपदेश करता हूँ, जो कोमल और कठोर भावों वाले सभी प्राणियों में निवास करता है॥44॥
 
Maharishi! Now I preach about the auspicious retirement that awakens the subtle feelings of the mind, which resides in all living beings with soft and hard feelings. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)