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mahabharat 14.42.34-35h: इनके अतिरिक्त आकाश में उड़ने वाले तथा सर्प आदि पेट के द्वारा चलने वाले अन्य सभी प्राणियों को भी अण्डजणु समझना चाहिए। ॥34 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 14.42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 42: अहंकारसे पञ्च महाभूतों और इन्द्रियोंकी सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवतका वर्णन तथा निवृत्तिमार्गका उपदेश  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  14.42.34-35h 
अपराण्यथ भूतानि खेचराणि तथैव च॥ ३४॥
अण्डजानि विजानीयात् सर्वांश्चैव सरीसृपान्।
 
 
अनुवाद
इनके अतिरिक्त आकाश में उड़ने वाले तथा सर्प आदि पेट के द्वारा चलने वाले अन्य सभी प्राणियों को भी अण्डजणु समझना चाहिए। ॥34 1/2॥
 
Besides these, all the other creatures that fly in the sky and those that move with their stomachs like snakes etc. should also be considered oviparous. ॥ 34 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)