त्वग्घ्राणश्रोत्रचक्षूंषि रसना वाक् च संयता:।
विशुद्धं च मनो यस्य बुद्धिश्चाव्यभिचारिणी॥ १०॥
अष्टौ यस्याग्नयो ह्येते न दहन्ते मन: सदा।
स तद् ब्रह्म शुभं याति तस्माद् भूयो न विद्यते॥ ११॥
अनुवाद
जिसकी त्वचा, नासिका, कान, नेत्र, रसना और वाक् इन्द्रियाँ वश में हैं, जिसका मन शुद्ध है और जिसकी बुद्धि एक निश्चय पर स्थिर है तथा जिसका मन उपर्युक्त इन्द्रिय रूपी आठ अग्नियों से व्याकुल नहीं होता, वह मनुष्य उस शुभ ब्रह्म को प्राप्त होता है, जिससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥10-11॥
The person whose skin, nostrils, ears, eyes, taste and speech senses are controlled, whose mind is pure and whose intellect is fixed on one determination and whose mind is not troubled by the eight fires in the form of the above mentioned senses, that man attains that auspicious Brahma, greater than whom there is no one else. 10-11॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥