अव्यक्तनामानि गुणांश्च तत्त्वतो
यो वेद सर्वाणि गतीश्च केवला:।
विमुक्तदेह: प्रविभागतत्त्ववित्
स मुच्यते सर्वगुणैर्निरामय:॥ २५॥
अनुवाद
जो पुरुष प्रकृति के इन नामों, सत्त्वगुणों और समस्त शुद्ध गतियों को ठीक-ठीक जानता है, वह गुण-विभाजन तत्त्व का ज्ञाता है। वह सांसारिक दुःखों से प्रभावित नहीं होता। शरीर त्यागने के पश्चात् वह समस्त गुणों के बंधन से मुक्त हो जाता है। 25॥
The man who knows exactly these names of nature, the Sattva qualities and all the pure movements, is the knower of the principle of division of qualities. He is not affected by worldly sorrows. After leaving the body, he becomes free from the bondage of all the gunas. 25॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य-संवादविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)