श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 39: सत्त्व आदि गुणोंका और प्रकृतिके नामोंका वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  14.39.22 
त्रयो गुणा: प्रवर्तन्ते ह्यव्यक्ता नित्यमेव तु।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणसर्ग: सनातन:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
ये तीनों गुण सर्वत्र विद्यमान हैं। ये तीनों अव्यक्त हैं और प्रवाह रूप में नित्य हैं। सत्व, रज और तम - इन गुणों की सृष्टि नित्य है॥ 22॥
 
These three gunas exist everywhere. These three are unmanifested and eternal in the form of flow. Sattva, Raja and Tamas – the creation of these gunas is eternal.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)